
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १॥
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
तासु दून कपि रूप देखावा।।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
आसिष देई गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।
करि माया नभु के खग गहई।।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
कनक कोट कर परम प्रकासा।।
सुंदरायतना घना।
चारु पुर बहु बिधि बना।।
रथ बरूथिन्ह को गनै।।
सेन बरनत नहिं बनै।। १ ।।
सर कूप बापीं सोहहीं।
रूप मुनि मन मोहहीं।।
समान अतिबल गर्जहीं।
एक एकन्ह तर्जहीं।। २ ।।
नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
खल निसाचर भच्छहीं।।
कथा कछु एक है कही।
त्यागि गति पैहहिं सही।। ३ ।।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
जोरि पानि कर बिनय ससंका।।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
तब जानेसु निसिचर संघारे।।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।
हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
राम कृपा करि चितवा जाही।।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
साधु ते होइ न कारज हानी।।
सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
आयहु मोहि करन बड़भागी।।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
देखी चहउँ जानकी माता।।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
बन असोक सीता रह जहवाँ।।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।
करइ बिचार करौं का भाई।।
संग नारि बहु किएँ बनावा।।
साम दान भय भेद देखावा।।
मंदोदरी आदि सब रानी।।
एक बार बिलोकु मम ओरा।।
सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
रघुपति बिरह अनल संजातं।।
कह सीता हरु मम दुख भारा।।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।
राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
जातुधान सेना सब मारी।।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
अवनि न आवत एकउ तारा।।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।
राम नाम अंकित अति सुंदर।।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
माया तें असि रचि नहिं जाई।।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
सत्य सपथ करुनानिधान की।।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
कहि कथा भइ संगति जैसें।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
काहि कहौं यह जान न कोई।।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।
करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
जातुधान अति भट बलवाना।।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा।।
समर भयंकर अतिबल बीरा।।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।
भगति प्रताप तेज बल सानी।।
होहु तात बल सील निधाना।।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बोला बचन जोरि कर कीसा।।
आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
परम सुभट रजनीचर भारी।।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।
फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
गए पुकारत कछु अधमारे।।
चला संग लै सुभट अपारा।।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।
पठएसि मेघनाद बलवाना।।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
ताहि एक छन मुरुछा आई।।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।
परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।
केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
देखउँ अति असंक सठ तोही।।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
पाइ जासु बल बिरचित माया।।
पालत सृजत हरत दससीसा।
अंडकोस समेत गिरि कानन।।
तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
बधे सकल अतुलित बलसाली।।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।
सहसबाहु सन परी लराई।।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जो सुर असुर चराचर खाई।।
मोरे कहें जानकी दीजै।।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू।।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
सब भूषण भूषित बर नारी।।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं।।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।
भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
लागेसि अधम सिखावन मोही।।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
भइ सहाय सारद मैं जाना।।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
भई सभीत निसाचर नारीं।।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
झपट लपट बहु कोटि कराला।।
एहिं अवसर को हमहि उबारा।।
बानर रूप धरें सुर कोई।।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
हरहु नाथ मम संकट भारी।।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।
गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा।।
तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
अंगद संमत मधु फल खाए।।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।
मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
आइ गए कपि सहित समाजा।।
मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।।
किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।
जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
जन्म हमार सुफल भा आजू।।
सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।
रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
बचन कहे कछु जनककुमारी।।
दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
निसरत प्रान करहिं हठि बाधा।।
स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
जरैं न पाव देह बिरहागी।
बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।
भरि आए जल राजिव नयना।।
सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
जब तव सुमिरन भजन न होई।।
रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
लोचन नीर पुलक अति गाता।।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।
प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कर गहि परम निकट बैठावा।।
केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखा तें साखा पर जाई।।
निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल।।
देहु कृपा करि अनपायनी।।
एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
कहा चलैं कर करहु बनावा।।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।
गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
तासु पयान सगुन यह नीती।।
फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
असगुन भयउ रावनहि सोई।।
गर्जहि बानर भालु अपारा।।
चले गगन महि इच्छाचारी।।
डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
लोल सागर खरभरे।
नाग किंनर दुख टरे।।
बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
नाथ गुन गन गावहीं।।1।।
बार बारहिं मोहई।
कठोर सो किमि सोहई।।
जानि परम सुहावनी।
लिखत अबिचल पावनी।।2।।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।
जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
बोली बचन नीति रस पागी।।
मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी।।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
सीता सीत निसा सम आई।।
हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।
बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
सिंधु पार सेना सब आई।।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
नर बानर केहि लेखे माही।।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
बोला बचन पाइ अनुसासन।।
मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।
भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।
तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।
कही बिभीषन नीति बखानी।।
खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
मंद करत जो करइ भलाई।।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।
आयूहीन भए सब तबहीं।।
कर कल्यान अखिल कै हानी।।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
दंडक कानन पावनकारी।।
कपट कुरंग संग धर धाए।।
अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।
आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
समाचार सब ताहि सुनाए।।
आवा मिलन दसानन भाई।।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
कामरूप केहि कारन आया।।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
मम पन सरनागत भयहारी।।
सरनागत बच्छल भगवाना।।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
मोरें सनमुख आव कि सोई।।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
नयनानंद दान के दाता।।
रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
आनन अमित मदन मन मोहा।।
मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।
तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
बोले बचन भगत भयहारी।।
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अति नय निपुन न भाव अनीती।।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया।।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।
लोभ मोह मच्छर मद माना।।
धरें चाप सायक कटि भाथा।।
राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।
जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
आवे सभय सरन तकि मोही।।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
देहु सदा सिव मन भावनी।।
मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड।।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।
ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
सर्बरूप सब रहित उदासी।।
कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
बिनय करिअ सागर सन जाई।।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।
करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
दैव दैव आलसी पुकारा।।
ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
सिंधु समीप गए रघुराई।।
बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
पाछें रावन दूत पठाए।।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
तेहि कोसलाधीस कै आना।।
दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार।।
चले दूत बरनत गुन गाथा।।
रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
होइहि जब कर कीट अभागी।।
कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।
मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
बिकटानन बिसाल भयकारी।।
सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।
इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
पदुम अठारह जूथप बंदर।।
जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।
सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर
मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सागर सन ठानी मचलाई।।
रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।
कहत दसानन सबहि सुनाई।।
लघु तापस कर बाग बिलासा।।
समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
उर अपराध न एकउ धरिही।।
एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
यह मत लछिमन के मन भावा।।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।
लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
दास तुलसी गायऊ।।
बिषाद रघुपति गुन गना।।
सुनहि संतत सठ मना।।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।
सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।
संदर्भ (Trusted Sources)
- सुंदरकांड पढ़ने के लाभ सुंदरकांड का नियमित पाठ करने से बुराइयों से मुक्ति मिलती है और जीवन में खुशहाली आती है।
- सुंदरकांड का महत्व सुंदरकांड रामायण का हृदय भाग है जो हनुमान जी की भक्ति और शक्ति को दर्शाता है।
- सुंदरकांड कब पढ़ें सुंदरकांड का पाठ मंगलवार, शनिवार या श्रावण महीने में करना शुभ माना जाता है।