
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ॥
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ॥
गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-संकट-बिकट ॥ १ ॥
उर बिसाल, भुजदंड चंड नख बज्र बज्रतन ॥
कपिस केस, करकस लंगूर, खल-दल बल भानन ॥
संताप पाप तेहि पुरुष पहिँ सपनेहुँ नहिँ आवत निकट ॥ २ ॥
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बेद बंदी बदत पैजपूरो ॥
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
पवनको पूत रजपूत रूरो ॥ ३ ॥
अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो ।
क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो ॥
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो ।
तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो ॥ ४ ॥
गाज्यो सुनि कुरुराज दल हलबल भो ।
बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
फलँग फलाँगहूँतें घाटि नभतल भो ।
हनुमान देखे जगजीवनको फल भो ॥ ५ ॥
निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
कंदुक-ज्योँ कपिखेल बेल कैसो फल भो ॥
काज जुग-पूगनिको करतल पल भो ।
लोकपाल पालनको फिर थिर थल भो ॥ ६ ॥
नापके भाजन भरि जलनिधि-जल भो ।
महामीनबास तिमि तोमनिको थल भो ॥
तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥ ७ ॥
अंजनीको नंदन प्रताप भूरि भानु सो ।
सरन आये अवन, लखनप्रिय प्रान सो ॥
प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥ ८ ॥
बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोरको ॥
तुलसीके हिये है भरोसो एक ओरको ।
नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोरको ॥ ९ ॥
महाबीर बिदित बरायो रघुबीरको ।
करुना-कलित मन धारमिक धीरको ॥
सुमिरे हरनहार तुलसीकी पीरको ।
सेवक सहायक है साहसी समीरको ॥ १० ॥
मीच मारिबेको, ज्याइबेको सुधापान भो ।
सोखिबे कृसानु, पोषिबेको हिम-भानु भो ॥
माँगिबो मलीनताको मोदक सुदान भो ।
तुलसीको साहेब हठीलो हनुमान भो ॥ ११ ॥
सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँकको ।
बापुरे बराक कहा और राजा राँकको ॥
ताकै जो अनर्थ सो समर्थ एक आँकको ।
जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँकको ॥ १२ ॥
लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
कीरति बिमल कपि करुनानिधानकी ।
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमानकी ॥ १३ ॥
महिमानिधान, गुन-ज्ञानके निधान हौ ।
लेत-дेत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥
लोक-बेद-बिधिके बिदुष हनुमान हौ ।
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥ १४ ॥
काज महाराजके समाज साज साजे हैं ।
जुग-जुग जग तेरे बिरद बिरजे हैं ।
सुनि सकुचाने साधु, खलगन गाजे हैं ।
जैसे होत आये हनुमानके निवाजे हैं ॥ १५ ॥
ढारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
दोष सुनाये तें आगेहुँको होशियार ह्वै हों मन तौ हिय हारो ॥ १६ ॥
तेरे निवाजे गरीबनिवाज बिराजत बैरिनके उर साले ।
बूढ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥ १७ ॥
तैं रन-केहरि केहरिके बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ॥
बानर बाज बढे खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ॥ १८ ॥
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ॥
पापतेँ, सापतेँ, ताप तिहुँतेँ सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ॥ १९ ॥
मन अनुमानि, बलि, बोल न बिसारिये ।
साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ॥
मोदक मरै जो, ताहि माहुर न मारिये ।
बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥ २० ॥
दीनबंधु दया कीन्हीं निरूपाधि न्यारिये ।
आस रावरीयै, दास रावरो बिचारिये ॥
माथे पगु बलीको, निहारि सो निवारिये ।
बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ॥ २१ ॥
केसरीकुमार बल आपनो सँभारिये ।
मोसे दीन दुबरेको तकिया तिहारिये ॥
सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
मकरी ज्यौं पकरिकै बदन बिदारिये ॥ २२ ॥
रामकी भगति, सोच संकट निवारिये ।
जीव-जामवंतको भरोसो तेरो भारिये ॥
सुथल सुबेल भालु बैठिकै बिचारिये ।
लंकिनी ज्यों लातघात ही मरोरि मारिये ॥ २३ ॥
तोसे समरथ चप चारिहुँ निहारिये ।
नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥ २४ ॥
बकी बकभगिनी काहूतें कहा डरैगी ।
बाँहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
पाप जाय सबको गुनीके पाले परैगी ।
बाँहपीर महाबीर, तेरे मारे मरैगी ॥ २५ ॥
बेदन बिषम पाप-ताप छलछाँहकी ।
पराहि जाहि पापिनी मलीन मनमाँहकी ॥
बावरी न होहि बानि जानि कपिनाँहकी ।
सपथ महाबीरकी जो रहै पीर बाँहकी ॥ २६ ॥
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ॥
रावनकी रानी मेघनाद महँतारी है ।
कौनके सकोच तुलसीके सोच भारी है ॥ २७ ॥
भूलत सरीरसुधि सक्र-रबि-राहुकी ।
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहुकी ॥
हाथ कपिनाथहीके चोटी चोर साहुकी ।
एते दिन रही पीर तुलसीके बाहुकी ॥ २८ ॥
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
आपनो बिसारिहैं न मेरेहू भरोसो है ॥
कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
चीरीको मरन खेल बालकनिको सो है ॥ २९ ॥
बढी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है ।
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥
को है जगजाल जो न मानत इताती है ।
ढील तेरी बीर मोहि पीरतें पिराति है ॥ ३० ॥
समत्थ हाथ पायको सहाय असहायको ।
रावन सो भट भयो मुठिकाके घायको ॥
सीदत सुसेवक बचन मन कायको ।
कौन पाप कोप, लोप प्रगट प्रभायको ॥ ३१ ॥
छोटे बडे जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
रामदूतकी रजाइ माथे मानि लेत हैं ॥
हनूमान आन सुनि छाडत निकेत हैं ।
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥ ३२ ॥
तेरे घाले जातुधान भये घर-घरके ।
सकल समाज साज सजे रघुबरके ॥
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हरके ।
देखिये न दास दुखी तोसे कनिगरके ॥ ३३ ॥
कूर कौडी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
पोषि तोषि थापि आपनो न अवडेरिये ॥
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
तुलसीकी बाँह पर लामीलूम फेरिये ॥ ३४ ॥
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
रोष बिनु दोष, धूम-मूल मलिनाई है ॥
हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजें तैं उडायी है ।
केसरीकिसोर राखे बीर बरिआई है ॥ ४४ ॥
गोसाँयि सुसाँयि सदा अनुकूलो ।
पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
पुकारत आरत आनंद भूलो ।
रहौं दरबार परो लटि लूलो ॥ ३६ ॥
पापके प्रभावकी सुभाय बाय बावरे ।
सोई बाँह गही जो गही समीरडावरे ॥
सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
जानियत सबहीकी रीति राम रावरे ॥ ३७ ॥
जरजर सकल सरीर पीरमई है ।
मोहिपर दवरि दमानक सी दई है ॥
ओट रामनामकी ललाट लिखि लई है ।
हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है ॥ ३८ ॥
मुँहपीर-केतुजा कुरोग जातुधান है ।
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥
जिनके समूह साके जागत जहान है ।
बेधे बरगदसे बनाइ बानवान है ॥ ३९ ॥
रामनाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
मोहबस बैठो तोरि तरकितराक हौं ।
अंजनीकुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ॥
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥ ४० ॥
देकि दीन दूबरो करै न हाय-हाय को ।
दियो फल सीलसिंधु आपने सुभायको ॥
बिहायि प्रभु-भजन बचन मन कायको ।
फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको ॥ ४१ ॥
मरिबेको बारानसी बारि सुरसरिको ।
जाके जिये मुये सोच करिहैँ न लरिको ।
मेरे मन मान है न हरको न हरिको ।
सोवू रघुबीर बिनु सकै दूर करिको ॥ ४२ ॥
हित उपदेसको महेस मानो गुरुकै ।
तुम्हरे भरोसे सुर मैँ न जाने सुरकै ॥
समाधि कीजे तुलसीको जानि जन फुरकै ।
रोगसिंधु क्यों न डारियत गाय खुरकै ॥ ४३ ॥
कृपानिधान संकरसोँ सावधान सुनिये ।
बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये ।
करैया राम बेद कहैँ साँची मन गुनिये ।
हौँ हूँ रहोँ मौन ही बयो सो जानि लुनिये ॥ ४४ ॥
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