श्री हनुमान चालीसा
वरनऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अंजनिपुत्र पवन सुत नामा॥
कुमति निवार सुमिति के संगी॥
कानन कुंडल कुंचित केसा॥४॥
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
राम काज करिबे को आतुर॥
राम लखन सीता मन बसिया॥८॥
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
रामचंन्द्र के काज सँवारे॥
श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥
तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥१२॥
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
नारद सारद सहित अहीसा॥
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
तुम रक्षक काहू को डरना॥
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
महावीर जब नाम सुनावैं॥२४॥
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
तिन के काज सकल तुम साजा॥
सोइ अमित जीवन फल पावै॥२८॥
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अस बर दीन जानकी माता॥
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
जो सुमिरैं हनुमत बलबीरा॥३६॥
कृपा करहु गुरू देव की नाईं॥
छूटहि बन्दि महासुख होई॥
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥४०॥
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
पवन सुत हनुमान की जय।
उमापति महादेव की जय॥
श्री राम जय राम जय जय राम
